मेरी बाहों को तुम्हारे शानों का एहसास आज भी है
मेरी नज़रों को तेरे चेहरे का अंदाज़ आज भी है
हंसी ना जाने कहॉ खो गयी मेरी
कानों में गूंजती तेरी आवाज़ आज भी है
महकते थे तेरी आरजू में जो कल
उन रास्तों को याद हमारा आगाज़ आज भी है
मुट्ठी में भरे हैं वादों के कांच, पर
करते तेरे आन्सूओ पर ऐतराज़ आज भी हैं
Author: I me myself
Tuesday, September 18, 2007
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2 comments:
शुक्रिया आपकी होस्लाफ्जाही का। आप भी दोनों ही लफ्जों में अच्छा लिखती हैं।
Liked it.. It's really very good!
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