रहने दो इस स्वप्न में मुझे तुम
अब सुबह होने न पाए
कहने दो हर बात अभी तुम
यह शब्द कहीं खोने ना पाएं
तुमसे जो हम आज जुड़े हैं
यह स्नेह कभी कम होने ना पाए
ऋतु आये ऋतु जाए लेकिन
मन तृप्त रहें, भरने ना पाए
चलते रहें, गंतव्य न पाएं
आँखों में सदा रहें यह आँखें
हंसें, खिलें, खिलखिलाती जाएँ...
- अ १८ सितम्बर २००९
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