Friday, September 18, 2009

स्वप्न परों पर ...

जीवन में सभी स्वप्न साकार नहीं हो पाते, कुछ अधूरे रह जाते हैं, कुछ टूट कर बिखर जाते हैं, कुछ हमारी दिनचर्या में ही कहीं खो जाते हैं.... इसलिए आज जो अपना स्वप्न जी रही हूँ, उससे श्वासों में समेट लेना चाहती हूँ... यह रचना है उस स्वप्न के प्रारंभ के लिए...

रहने दो इस स्वप्न में मुझे तुम
अब सुबह होने न पाए

कहने दो हर बात अभी तुम
यह शब्द कहीं खोने ना पाएं

तुमसे जो हम आज जुड़े हैं
यह स्नेह कभी कम होने ना पाए

ऋतु आये ऋतु जाए लेकिन
मन तृप्त रहें, भरने ना पाए

जीवन की बरखा में हम यूँ हीं
चलते रहें, गंतव्य न पाएं

आँखों में सदा रहें यह आँखें
हंसें, खिलें, खिलखिलाती जाएँ...

- अ १८ सितम्बर २००९

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